दशामाँ की व्रत कथा

दशामाँ की व्रत कथा





प्राचीन काल में कर्णावती नामक एक नगरी थी। उसका राजा कर्णदेव अहंकार और भोगविलास में व्यस्त रहता था। वह जितना अभिमानी था उतनी ही उसकी पत्नि कमलावती सुशील थी. जब कि कर्णदेव नास्तिक था, कमलावती को भगवान में अपार श्रद्धा थी। वह भगवान की भक्ति में मग्न रहती थी।

रानी कमलावती ने कर्णदेव को अनेक बार समझाया कि अभिमान बुरी चीज है। इन्सान को धार्मिक कार्य में ध्यान पिरोना चाहिये। सुख और वैभव क्षणिक है। आज है कल नहीं। परंतु राजा तो रानी की बातों पर गौर करने के बजाय भोगविलास में ज्यादा मस्त रहता था। शराब और शबाब में उसने अपनी सारी जिंदगी डुबो दी थी।

एक दिन रानी सरोवर के किनारे आये हुए अपने महल के झरोखे में खड़ी थी। उसने सामने एक मंदिर में कुछ स्त्रियों को
व्रत करते हुए देखा। उसने दासी को बुलाया और वे स्त्रियाँ क्या करती थी उसकी जानकारी लेकर वापस आने को कहा। थोडी देर के बाद दासी जानकारी लेकर वापस आई और रानी से कहा, "वे स्त्रियाँ दशामाँ का व्रत कर रही है।"

रानीने पूछा, "तुने यह जाना कि यह व्रत कैसे करते है ?" "हाँ उन्हों ने कहा कि जिसे व्रत करने की इच्छा हो, उसे सूत के दस तार लेकर उसमें गाँठ लगानी चाहिये और प्रत्येक गाँठ को कंकु का तिलक लगाना चाहिये। इस दशामाँ के डोरे को लेकर व्रत का प्रारंभ किया जाता है। घर जाकर दशामाँ की मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसका पूजन करना चाहिए।

यह सुनकर रानी को भी दशामाँ का व्रत करने की तीव्र इच्छा हुई। उसने राजा से यह बात की।

राजाने उसकी खिल्ली उडाते हुए कहा, "रानी, यह व्रत सब ठकोसला है। हमारे पास किस चीज की कमी है जो तुम्हें इस व्रत से पूरी करनी है? हमारे पास धन, दौलत, कीर्ति, सुख, शांति, संतति सब कुछ तो है। फिर तुम्हें इस व्रत करने की क्या आवश्यकता है?"

इस तरह राजा ने रानी को यह व्रत करने से स्पष्ट इन्कार कर दिया। रानी उदास होकर बाहर चली गई।

परंतु माँ दशामाँ अपना यह अपमान होते हुए देख अत्यंत क्रोधित हो उठी। उसने राजा को सबक सिखाने की ठान ली।

दूसरे दिन सूर्योदय होते ही पडोसी देश का राजा कर्णावती पर आक्रमण करने आया। कर्णदेव युद्ध में हार गया। वह रानी और अपने दो बेटों को लेकर भाग निकला। रास्ते में रानी ने उसे कहा कि तुमने मुझे व्रत करने से रोका इससे माँ दशामाँ कोपित हुई है। यह इसका ही परिणाम है। राजा ने रानी को पीटा।

भूख, प्यास, थकान और त्रास सहन करते करते राजा, रानी और दो कुमार एक उपवन में पहचे। थकान मिटाने के लिये वे पेड नीचे बैठे ही थे कि सारे उपवन के पेड, पौधे, फूल और हरियाली सुख गई। जैसे वहा उपवन कभी पहेले था ही नहीं।

राजा, रानी और उनके दो कुमार यह देखकर घबरा उठे। इतने में उपवन का माली आया। उसने भी जो दृश्य देखा तो हलबला उठा। उसने सोचा जरुर यह लोग अकर्मी है। वर्ना दो क्षण पहले यहाँ हरियाली थी और अब ? उसने चारों को उपवन से बाहर निकाल दिया। चारों विवश और लाचार थे।

राजा, रानी और दो कुमार निराश होकर वहाँ से आगे बढे ।


थोडे दूर जाने के बाद एक गाव आया। वहा सीडीयोंवाला गहरा कुआँ था। सबने सोचा क्यों न प्यास बुझा ली जाय। दोनों कुमार बोंडे और सीडीयाँ उतरकर कुएँ में पहुंचे। परंतु जैसे ही अंदर गये तो अदृश्य हो गए। राजा और रानी ने दोनों को बहुत ढुंढा लेकिन न मिले तो रुदन करने लगे। राजा को अब मन ही मन पछतावा होने लगा की मानो या न मानो वह दशामाँ के क्रोध का शिकार बना है। पहले राज गया, अब दोनों राजकुमार।

राजा और रानी आगे बढे।


उसने रानी से एक गाँव आया। राजा आनंदित हो उठा। कहा, अरे यह तो मेरी बहन का गाँव है। चलो, हम उसे मिलते है।" थोडी देर बाद एक व्यक्ति को नगर की और जाते देखकर राजा ने उससे अपने आगमन का समाचार अपनी बहुन तक पहुँचाने को कहा।

बहनने एक घडे में मिठाई भरी और सेवक से एक पात्र अपने भाई को दे आने को कहा। उसने उस पात्र में सोने का एक कडा भी रखा। ताकी जरुरत पड़ने पर काम आ सके।

राजाने उस पात्र में देखा तो मिठाई की जगह कोयले और कडे की जगह एक साँप था। उसकी आंखे विस्फारित हो उठी।

राजा क्रोध से आगवबुला हो उठा। वह मान नही सका कि उसकी बहन उसे खाने के लिये कोयले और मारने के लिये साँप भेज सकती है।

राजा सिर पकडकर बैठ गया। फिर से सोचा तो प्रतीत हुआ कि यह सब दशामाँ के अपमान का ही नतीजा है। लेकिन वो करे तो क्या करें ?

उसने वह घडा जमीन में गाड दिया।

फिर दोनों आगे बढे ।


इतने में एक नदी आई। नदी किनारे खरबूजे का खेत थी। रानी को खूब भूख लगी थी। उसने चौकीदार को एकः खर‌बूजा देने के लिये बिनती की, चोकीदार ने उसे खरबूजा दिया। रानी ने उसे अपने पल्लु से बाँधा और आगे जाकर खाने का निश्चय किया।

इनाध्वे थोडे ही दूर गये थे कि राजा के सिपाही वहाँ आ पहुँचे। उन्हों ने दोनों को रोका और उनकी तलाशी ली।

सिपाही ने रानी से पूछा, "यह पल्लू में क्या है?" रानीने कहा, "खरबूजा।"।

"दिखाओ।"गगर

सिपाही ने पल्लू में देखा तो खरबूजे की जगह राज्य से गायब हुए राजकुमार का कटा हुआ सर था। सिपाही तो क्रोध से लाल हो गए। उन्हों ने राजा-रानी दोनों को बाँध कर राजा के सामने खड़ा किया। राजा भी क्रोधित हुआ और दोनों को कारावास में कैद करने का आदेश दिया। ਚੀਨ ਇਸ ਨਾਲ ਸੰਤ

कैद में बैठे बैठे राजा-रानी इस घटना पर सोचने लगे। उन्हें अब विश्वास हो चला था कि जो कुछ हो रहा था वह दशामाँ के क्रोध का ही परिणाम था। अतः दशामा के क्रोध को अवश्य शांत करना चाहिए।

रानी ने दशामा की तपश्चर्या शुरु की। दस दिन तक राजा और रानी दोनों ने दशामा के जाप किये और निराहार उपवास किये। उन्होंने दशा माँ की मानसिक सेवापूजा की। और अपनी भूलों को माफ करने की याचना की।

राजा-रानी की इस भक्ति को देखकर मा दशामा उन पर प्रसन्न हुए और सपने में दर्शन दिये और कहा कि अब तुम दोनों की स्थिति सुधरेगी।

दूसरे ही दिन माँ दशामाँ ने शत्रु राजा को सपने में आकर कहा, हे राजा, तूने उन निर्दोष पति-पत्नी को बेकार ही जेल में कैद किया है। सुबह होते ही उन दोनों को मुक्त कर देना, वर्ना तेरा सर्वनाश हो जायेगा। तेरा राजकुमार चला गया था वह अब भी जीवित है। वह कल सुबह वापस आ जायेगा।"

दूसरे दिन राजकुमार महल में वापस आया तो राजा आनंद से फुला न समाया। उसने राजा और रानी को छोड दिया।"

राजा और रानी ने माता दशामाँ का आभार व्यक्त किया और उनके गुणगान गाते गाते आगे बढे। वे फिर से राजा की बहन के गाँव वापस आये। राजा ने जो घडा जमीन में गाड दिया था वह फिर से खोद निकाला।

उसने अंदर देखा तो मिठाई और सोने का कड़ा था। राजा की बहन को पता चला कि भाई आया है तो उसके पास आई और दोनों को अपने घर ले गई। उसने दोनों को भरपेट खिलाया और बहुत सेवा की।

थोडे दिन बाद राजारानी ने उनकी विदाय ली और अपने राज्य की और आगे बढे। वे उस सीडीवाले कुए की पास आये तो अंदर से दो राजकुमार दौडते दौडते उनके पास आए।

राजाने पूछा, "अरे, तुम कहाँ थे?"


जवाब देने से पहले ही माँ दशामाँ ने अपना असल स्वरूप प्रकट किया और राजारानी एवं दोनों राजकुमारों को आशीर्वाद देते हुए कहा, "हे राजन, तेरी रानी की भक्ति से मैं अत्यंत प्रसन्न हुई हूँ। उसकी धर्मपरायणता निःसंदेह प्रसंशनीय है। मुझे खुशी है कि तुं भी अब सुधर गया है। मैं तुम सब पर खुश हूँ। तुम्हें अपना राज्य वापस दिलाती हूं।"

राजा और रानी दोनों माँ दशामाँ के पैरों में गिर पड़े और कहा, "माँ, आप तो बडी दयालु है। आपकी महिमा अपरंपार है। आपकी कसौटी में से खरा उतरना पामर मनुष्य के लिये अत्यंत कठिन है। आप अपनी कृपा दृष्टि हम पर बनाये रखना और हमारी रक्षा करना।'

दशामाँ ने कहा, "हे राजन, जो कोई भी व्यक्ति मेरा व्रत करेगा, उस पर सदा मेरी कृपादृष्टि होगी, जो कोई मेरा अपमान करेगा वह भर क्रोध का भोग बनेगा।"

और माँ अदृश्य हो गई।


फिर राजा ने प्रजा का साथ लिया और शत्रु राजा पर हमला करके अपना राज्य वापस लिया।

राजा ने माँ दशामाँ का मंदिर बनावाया और प्रजा को भी उनकी महिमा समझाई।

वे सुख-शांति से रहने लगे।

दशामाँ ने जिस तरह राजा-रानी पर अपनी कृपादृष्टि रखी उसी तरह हम पर भी उनकी कृपादृष्टि बनी रहे।


जय माँ दशामाँ।




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