ओबरी की लाल मिट्टी

बहुत बढ़िया बात कही आपने 🙏 —
आप ओबरी (OBRI), डूंगरपुर, राजस्थान की एक पूरी तरह ओरिजिनल, दिल से लिखी कहानी चाहते हैं, जो इंटरनेट पर कहीं न हो, बिल्कुल नई हो, लेकिन उस मिट्टी, उस गाँव की सच्ची खुशबू लिए हो।

यह रही —


🌾 “ओबरी की लाल मिट्टी”

(एक मौलिक कहानी)

डूंगरपुर की पहाड़ियों के बीच बसा छोटा-सा गाँव ओबरी, सूरज की पहली किरण से ही जाग उठता है। यहाँ सुबह का मतलब सिर्फ उजाला नहीं होता, बल्कि हर घर से उठती लकड़ी की खुशबू, मवेशियों की घंटियों की आवाज़ और बर्तनों की छनक से शुरू होता है।

पर उस साल कुछ अलग था।
बारिश रुक-रुक कर आई थी। खेतों में दरारें थीं, और लोगों के चेहरों पर चिंता की लकीरें।
ओबरी की धरती लाल जरूर थी, पर उसमें अब नमी नहीं बची थी।

गाँव की सबसे बुज़ुर्ग महिला मायली बाई कहती थी —

“मिट्टी जब प्यास लगे तो वो अपनी आवाज़ से बता देती है।”

लेकिन कोई उसकी बात पर ध्यान नहीं देता था। सब अपने-अपने काम में लगे रहते।

🌿 एक दिन...

गाँव के दो लड़के — कमलेश और राजू, बकरियाँ चराते हुए पहाड़ी के पीछे गए। वहाँ उन्होंने एक पुराना रास्ता देखा जो झाड़ियों से ढका हुआ था। मिट्टी के नीचे कुछ पत्थरों की दीवार जैसी दिखी। उन्होंने मिट्टी हटाई तो नीचे से ठंडी हवा का झोंका निकला।
“राजू, देख तो... नीचे पानी है शायद!”
वे भागते हुए गाँव पहुँचे और सबको बुला लाए।

गाँव के लोग इकट्ठा हुए। झाड़ियों को हटाया गया। धीरे-धीरे, वहाँ एक पुराना कुण्ड निकल आया — बहुत पुराना, जिसे किसी ने शायद दशकों पहले बंद कर दिया था।
दीवार पर लिखा मिला — “ओबरी माता का स्थल”।

💧 जल का वरदान

जब लोगों ने सफाई की और पत्थर हटाए, तो कुण्ड से पानी रिसने लगा।
पहले थोड़ा, फिर धार बनकर बहने लगा।
ओबरी की लाल मिट्टी ने मानो साँस ली। खेतों में हरियाली लौटने लगी, और गाँव की औरतें हर सुबह उस कुण्ड पर दीपक जलाने लगीं।

🌸 विश्वास की नई शुरुआत

गाँव के स्कूल में बच्चों ने उस कुण्ड पर आधारित एक छोटा उत्सव शुरू किया — “ओबरी जल दिवस”।
हर साल बच्चे वहाँ पेड़ लगाते, मिट्टी के दीये बनाते और मायली बाई की पुरानी बात याद करते —

“जब मिट्टी बोलती है, तो सुनना चाहिए।”

आज भी जब बारिश आती है, और हवा मिट्टी को छूती है, तो ओबरी के लोग कहते हैं —

“यह वही ओबरी माता का आशीर्वाद है, जिसने हमारी धरती को फिर से ज़िंदा किया।”


मैंने इसे डूंगरपुर की पहाड़ी, ओबरी गाँव की जीवनशैली, भाषा और भावनाओं को ध्यान में रखकर खुद लिखा है।

क्या आप चाहेंगे कि मैं इस कहानी को राजस्थानी बोली में भी रूपांतरित कर दूँ (जैसे स्थानीय भाषा की मिठास में)?

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